विकास का क्रमिक काल

वर्ष  1888 में मुरगांव पत्तन के शुरूआती दौर में यहां 358 मीटर लंबे ब्रेकवाटर सहित 3  घाट थे। समय के साथ साथ अवसंरचना में शनै शनै वृध्दि होती गई। वर्ष 1922 तक घाट सं. 4 तथा 5 का निर्माण और ब्रेकवाटर को मौजूदा 522.40 मी. लम्बाई तक बढाया गया। 270  मीटर का एक तटबंध भी निर्मित किया गया ।

गोवा में खनिज उद्योग का प्रमुख उद्योग के रूप में आविर्भाव होने के कारण पुर्तगालियों ने एक लौह अयस्क टर्मिनल के रूप में मुरगांव पत्तन के विकास हेतु एक मास्टर प्लान बनाया जिसमें “कई लौह अयस्क निर्यातकर्ताओं द्वारा प्रावधानित तथा वित्तपोषित यांत्रिक अयस्क लदान संयंत्रों से पोषित एक समर्पित घाट की योजना बनाई”। इसके अनुसरण में वर्ष 1959 में मेसर्स चौगुले एण्ड कंपनी प्रा.लि.को घाट सं. 6 पर एशिया का सबसे पहला यांत्रिक अयस्क सम्हलाई संयंत्र जिसकी 1000  ट. प्र. घ. क्षमता थी,स्थापित करने की अनुमति दी गई थी। इस घाट के संयोजन में घाट सं.7 का निर्माण किया गया।दिनांक 19 दिसंबर, 1961 को गोवा की स्वतंत्रता से गोवा इतिहास में एक नए युग की शुरूवात हुई ।

अवसंरचनाओं के विकास पर जोर देने के कारण मुरगांव पत्तन में काफी मात्रा में बदलाव हुए। स्वतंत्रता के कुछ ही वर्षों बाद पत्तन,रेल प्रबंधन से अलग हो गया। वास्को द-गामा से रेल में अंतरित हो गया।जबकि पत्तन ने वास्को-द-गामा इंटरचैंज प्वाइंट से हारबर क्षेत्र के बीच अपनी गोवा की सीमा तक मुख्य रेल सेक्शन दक्षिण रेल प्रणाली परिचालित की ।

वर्ष 1948  से लौह अयस्क यातायात के महत्व में वृध्दि हुई। जापान के लोग देश का पुनर्निर्माण कर रहे थे और गोवा के लौह अयस्क ने जापानी औद्योगिक क्रांति में प्रमुख भूमिका निभाई। मूल्य तथा अन्य तर्कों को ध्यान में रखते हुए जापान ने अपने इस्पात उद्योग को बढाने हेतु गोवा के लौह अयस्क को प्रमुखता दी। मुरगांव पत्तन तब अति वृध्दि की ओर अग्रसर हुआ। मुरगांव पत्तन अब पुर्तगाल से टेबल वाईन का आयात तथा हुबली से खली का निर्यात करनेवाला सुस्त पत्तन नहीं रहा ।

विदेशी उद्यमियों द्वारा पहले ही अन्य अवसर खोले गए थे। जोसेफिन हाऊगेज अमरिकी पासपोर्ट धारी एक ऐसी ही सीरियाई थी । उसने अमरिकी चाकलेट निर्यातकों को गोवा के काजू से परिचित करवाया। वॅाल स्ट्रीट मंदा पड चुका था । वर्ष 1929 में अमरिकी चाकलेट और पेस्ट्री निर्माता अपने उत्पादों में मुख्यतया बादाम और अखरोट इस्तमाल करते थे जिसकी वजह से यह ग्राहकों की पहुंच से बाहर हो जाते थे। जबकी आयातकर्ताओं के लिए काजू मंगानेवालों को अतिरिक्त समुद्री जहाज प्रभार देना पडता था लेकिन तुलना में सस्ते पडते थे और वॅालस्ट्रीट बाजार मंदी होने के वर्ष में अमरिकी उत्पादकों ने पौष्टिक तथा स्वादिष्ट गोवा को ही प्रमुखता दी।

वर्ष 1947 से गोवा के लौह अयस्क खदानों से वाणिज्यिक स्तर पर दोहन होने के कारण मुरगांव पत्तन की यातायात पध्दति में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया। वर्ष 1953 में इस पत्तन का यातायात बढ़कर 2.78 लाख टन से अधिक हो गया। इसके बाद के वर्षों में यातायात दुगुनी रफ्तार से बढ़ता हुआ वर्ष 1973-74 में 6.4  लाख से 14.8  मिलियन टन हो गया। आज,मुरगांव से निर्यात होनेवाला लौह अयस्क पूरे भारत से कुल निर्यात होनेवाले लौह अयस्क का 39 प्रतिशत बनता है और यह पत्तन देश के महापत्तनों में एक विशिष्ट स्थान रखता है।

यातायात में वृध्दि होने से उपलब्ध सुविधाओं की अपर्याप्तता महसूस की गई और इससे साहसी उद्यमियों के लिए नए अवसर खुले।

1959 में चौगुले और कंपनी प्रा.लि.ने पुर्तगाली सरकार से छूट प्राप्त करते हुए 10,000 टन प्र. घं. क्षमतावाले यांत्रिक लौह अयस्क संयंत्र की स्थापना की।इसके बारे में कहा जाता है कि यह एशिया में अपनी तरह का पहला संयंत्रं था।

1964 में मुरगांव को महापत्तन घोषित करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है क्योंकि इससे यह देश के दस महापत्तनों में शामिल हो गया। इससे पत्तन प्रशासन को अपने स्थाई विकास योजनाओं की ओर ध्यान देने का अवसर प्राप्त हुआ और उसके नव गठित न्यासी मंडल को वित्तीय तथा महत्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त हो गया।

हाल ही में ब्राज़ील तथा ऑस्टेलिया का अयस्क सम्हलाई निर्यातक देश के रूप में आविर्भाव होने से लौह अयस्क उद्योग बाजार में अब महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहा है।

इसलिए वर्ष 1965 में लौह अयस्क निर्यात के संबंध में अधिक जल डुबाव और उच्च लदान क्षमता की व्यवस्था के लिए मुरगांव पत्तन के सुव्यवस्थित विकास को ध्यान में रखते हुए कंसल्टिंग इंजीनियरिंग फर्म से एक ऐसी परिप्रेक्ष्य योजना तैयार करवाई गई जिसमें परिवहन लागत कम हो और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी हो।

इस दिशा में पहले कदम के रूप में पत्तन विकास हेतु रेंडल,पाल्मर व ट्रीटन के कंसल्टिंग इंजीनियरिंग फर्म द्वारा फरवरी,1965 में एक 20 वर्षीय परिप्रेक्ष्य योजना तैयार की गई। तत्पश्चात परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत पत्तन के लिए आधुनिक यांत्रिक अयस्क सम्हलाई सुविधा की स्थापना करने के लिए एक डिजाइन स्टडी तैयार करने हेतु फरवरी 1968 में, होवे (इंडिया) प्रा. लि. की नियुक्ति की गई। ,होवे (इंडिया) प्रा. लि. की रिपोर्ट पर अनुवर्ती कारवाई के रिसीविंग, स्टॅाकपाईलिंग, रिक्लेमिंग, वेईंग तथा शिपलोडिंग के लिए वर्ष 1979 में एक यांत्रिकृत अयस्क सम्हलाई सुविधा का संस्थापन कर उसकी शुरूआत की गई। अयस्क सम्लाई प्रणाली की निर्धारित भारण क्षमता करीब 8,000 टन प्रति घं. थी। शुरूआत में 60,000 कुलधारितावालों अयस्क वाहकों की भारण सुविधा हेतु चैनलों तथा घाटों का निकर्षण कार्य किया गया।आनेवाले अयस्क की जल्द तथा अधिक प्रभावी सम्हलाई के लिए बजरा उतारकों व रेल वैगन टिपरों की व्यवस्था की गई ।

महापत्तन बनने के बाद ही प्रमुख पत्तन विकास कार्य किए गए। भारत सरकार की विविध पंचवर्षीय योजनाओं के तहत कई विकास परियोजनाएं कार्यान्वित की गई। परिणामस्वरूप वर्ष 1976 में एक समर्पित खनिज तेल घाट,घाट सं.8 का निर्माण किया गया। बाद में पत्तन में सामान्य नौभार यातायात में धीरे- धीरे वृध्दि होती गई। पत्तन में नौभार सम्हलाई सुविधाओं को बढाने की दृष्टि से कई योजनाएं कार्यन्वित की गई। वर्ष 1985 और 1994 में क्रमशः 11.00 मी. तथा 12.50 मी. गहरे डुबाववाले दो बहुप्रयोज्य सामान्य नैभार घाट सं. 10 तथा 11 का निर्माण कर उसकी शुरूआत की गई। इस बीच घाट सं. 6 पर वर्ष 1959 में संस्थापित यांत्रिक अयस्क सम्हलाई संयंत्र पुराना होने के कारण वर्ष 1992 में बंद कर दिया गया। पुराने घाट 1 तथा 3 को एक आधुनिक जहाज मरम्मत सुविधा का संस्थापन किए जाने हेतु वेस्टर्न इंडिया शिपयार्ड लि. नामक एक प्राईवेट कंपनी को पटटे पर दिया गया। वर्ष 1995 में इस सुविधा की शुरूआत की गई। वर्ष 1997 में दक्षिण मध्य रेल से,जुडनेवाली पत्तन के मीटर गेज रेल को ब्रॅाड गेज में अंतरित किया गया। इस ब्रॅाड गेज रेल प्रणाली के कारण अब भारत के किसी भी स्थान से मुरगांव पत्तन तक पहुंचना आसान हो गया ।